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2/14/2020

मोहब्बत के लिए पहाड़ का सीना चीर देने वाले बिहारी दशरथ मांझी की प्रेम कहानी


 गया :दशरथ मांझी के बारे में जो कहा जाए वह कम है. वे करिश्माई शख्स थे. जिस तरह मुगल बादशाह शाहजहां ने अपने प्यार की खातिर संगमरमर का ताज महल बना डाला था, उसी तरह उस इंसान ने अपनी पत्नी की खातिर पहाड़ का सीना चीर डाला और अपना पूरा जीवन सड़क बनाने के लिए झोंक दिया. उस शख्स ने दिन देखा, न रात देखी, उसका सिर्फ एक ही लक्ष्य था, पहाड़ को काटकर राह बनाना, जिससे उसका जीवन आसान हो सके, जिसे वे प्यार करते थे.गया जिले के गहलौर गांव के करीब पहाड़ के बीचों बीच से गुजरता यही रास्ता दशरथ मांझी की पहचान है. ना बड़ी बड़ी मशीनें थीं और ना ही लोगों का साथ – दशरथ मांझी अकेले थे और उनके साथ थे बस ये छेनी, ये हथौड़ा और 22 बरस तक सीने में पलता हुआ एक जुनून. दशरथ का वो जुनून अटारी ब्लाक के गहलौर गांव के लिए एक तोहफे में बदल गया.



दशरथ मांझी का ये काम कितना बड़ा था ये समझने के लिए जरा इस नक्शे पर गौर कीजिए. गहलौर की जरूरत की हर छोटी बड़ी चीज, अस्पताल, स्कूल सब इस वजीरपुर के बाजार में मिला करते थे लेकिन इस पहाड़ ने वजीरगंज और गहलौर के बीच का रास्ता रोक रखा था. लोगों को 80 किलोमीटर लंबा रास्ता तय करके वजीरगंज तक पहुंचना पड़ता था. दशरथ मांझी ने इस पहाड़ को अपने हाथों से तोड़ दिया और बना दिया एक ऐसा रास्ता जिसने वजीरपुर और गहलौर के बीच की दूरी को महज 2 किलोमीटर में समेट दिया।1934 में जन्मे दशरथ मांझी की शादी बचपन में ही हो गई थी लेकिन दशरथ मांझी की मोहब्बत तब परवान चढ़ी जब वो 22 साल की उम्र में यानी 1956 में धनबाद की कोयला खान में काम करने के बाद अपने गांव वापस लौटे और गांव की एक लड़की से उन्हें मोहब्बत हो गई. लेकिन किस्मत देखिए ये वही लड़की थी जिससे दशरथ मांझी की शादी हुई थी.
दशरथ मांझी ने ये पहाड़ तोड़ने का फैसला अपनी उसी मोहब्बत यानी फाल्गुनी के लिए किया था.

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